शुक्रवार और माता लक्ष्मी: धन नहीं, धर्म से आती है स्थायी समृद्धि,
शुक्रवार, माता लक्ष्मी और स्थायी समृद्धि का सनातन दर्शन,
-हरिशंकर सैनी
सनातन संस्कृति में शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी को समर्पित माना गया है। लक्ष्मी को केवल धन की देवी मानना उनका सीमित अर्थ है। वास्तव में वे धर्म, विवेक और सदाचार से उत्पन्न समृद्धि की प्रतीक हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि लक्ष्मी चंचल हैं। इसका आशय यह नहीं कि वे अस्थिर हैं, बल्कि यह कि वे आचरण देखकर निवास करती हैं। जहां अहंकार, अपव्यय और अनैतिकता होती है, वहां लक्ष्मी अधिक समय तक नहीं टिकतीं।
माता लक्ष्मी का संबंध शुक्र तत्व से माना गया है। शुक्र जीवन में सौंदर्य, संतुलन, कला और सुख का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन यदि यह तत्व संयम से रहित हो जाए, तो वही सुख भोग-विलास बनकर जीवन को असंतुलित कर देता है। इसलिए लक्ष्मी पूजा के साथ विवेक और मर्यादा का पालन अनिवार्य बताया गया है।
धार्मिक परंपरा में शुक्रवार को घर की स्वच्छता, दीप प्रज्वलन और मधुर व्यवहार पर विशेष जोर दिया गया है। यह संकेत करता है कि लक्ष्मी केवल मंदिर में नहीं, बल्कि व्यवहार और वातावरण में निवास करती हैं।
आज के समय में धन अर्जन जीवन की अनिवार्यता बन चुका है, लेकिन धन का उद्देश्य भूलते जा रहे हैं। माता लक्ष्मी का संदेश स्पष्ट है—धन वही शुभ है, जो सेवा, सुरक्षा और समाज के हित में उपयोग हो।
यह भी माना जाता है कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, अतिथि का सत्कार होता है और श्रम का मूल्य समझा जाता है, वहां लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करती हैं। इसलिए लक्ष्मी पूजा आत्मचिंतन का अवसर भी है।
निष्कर्षतः शुक्रवार केवल समृद्धि की कामना का दिन नहीं, बल्कि समृद्धि को संभालने की सीख भी देता है। जब धन के साथ धर्म और विवेक जुड़ जाता है, तभी लक्ष्मी कृपा स्थायी बनती है।
माता लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं,
वे विवेक, सदाचार और संतुलन की प्रतीक हैं।
जहां आचरण शुद्ध होता है, वहीं लक्ष्मी स्थिर होती हैं।
शुक्रवार हमें याद दिलाता है—
धन वही शुभ है, जो धर्म से जुड़ा हो।
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भवानी गिरी जी महाराज
