यूपीएससी की शताब्दी पर बोले प्रधानमंत्री, राष्ट्र और नागरिक को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली हो प्रशासनिक व्यवस्था

हरिशंकर सिंह

नई दिल्ली। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रशासनिक सेवाओं की बदलती भूमिका और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से बात की। भारत मंडपम में आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री ने कहा कि यूपीएससी की एक सदी की यात्रा केवल एक संस्था की उपलब्धि नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं की आकांक्षाओं और प्रत्येक भारतीय के उस विश्वास का उत्सव है, जो इस संस्था से जुड़ा है। उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था के लिए राष्ट्र सर्वोपरि और नागरिक सर्वोपरि के सिद्धांत को आधार बनाने पर जोर दिया।

1926 में स्थापित यूपीएससी ने एक सदी के दौरान बदलती सरकारों, पीढ़ियों, तकनीक और परीक्षा प्रणाली के बीच अपनी संस्थागत भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता से पहले स्थापित यह व्यवस्था स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप बदली और प्रशासन तथा जनसेवा की व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनी। उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद नवगठित राष्ट्र के सामने शासन व्यवस्था को मजबूत करने की बड़ी चुनौती थी और सरदार पटेल ने इसके लिए आवश्यक संस्थागत आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री ने कहा कि शताब्दी का यह अवसर अतीत को याद करने के साथ भविष्य की दिशा तय करने का भी समय है। अगले 25 वर्ष देश के लिए महत्वपूर्ण हैं और आज जिन युवाओं का चयन प्रशासनिक सेवाओं में होगा, वे विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में चयन प्रक्रिया को केवल परीक्षा और ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि सेवा में आने वाले युवा की जनसेवा को लेकर सोच और प्रेरणा क्या है।

उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सेवाओं में ऐसे युवाओं को लाने की आवश्यकता है, जो पद से अधिक लोकसेवा से प्रेरित हों। प्रधानमंत्री के अनुसार भर्ती प्रक्रिया में उम्मीदवार के ज्ञान और योग्यता का परीक्षण तो आवश्यक है ही, लेकिन उसकी मूल प्रेरणा को समझना भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि जब प्रशासन में ऐसे लोग आएंगे, जिनके लिए नागरिक सेवा प्राथमिकता होगी, तो बदलती जन आकांक्षाओं के अनुरूप शासन व्यवस्था को ढालना आसान होगा।

नागरिक को शासन व्यवस्था के केंद्र में रखने पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने ‘नागरिक देवो भव’ का मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि देश का नागरिक प्रशासन के लिए सर्वोच्च महत्व रखता है। पुराने ‘माई-बाप’ शासन के तरीके से आगे बढ़ते हुए ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें सरकार और प्रशासन नागरिकों की जरूरतों को समझकर समय पर समाधान उपलब्ध कराएं।

प्रधानमंत्री ने 21वीं सदी की प्रशासनिक कार्य संस्कृति के तीन प्रमुख आधार भी बताए। उन्होंने कहा कि आज का भारत जनहितैषी, सक्रिय और सुशासन पर आधारित नई कार्य संस्कृति के साथ आगे बढ़ रहा है। प्रशासन को केवल समस्या आने के बाद प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि समस्याओं का पहले से अनुमान लगाकर समाधान तलाशने वाली व्यवस्था के रूप में विकसित करना होगा।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 का भारत आज के भारत से सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी अलग होगा। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और गांवों तथा शहरों के बीच घटते अंतर के साथ नागरिकों की अपेक्षाएं भी बढ़ेंगी। तकनीक के विस्तार के कारण लोगों को तत्काल समाधान की आदत होगी। ऐसे समय में प्रशासनिक सेवाओं को भी उसी गति के अनुरूप अपने कामकाज में बदलाव करना होगा।

प्रधानमंत्री ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले समय में नागरिकों की अपेक्षाएं वास्तविक समय में समाधान उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था की होंगी। इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों को नई तकनीक को समझने और उसका प्रभावी उपयोग करने के लिए तैयार रहना होगा।

भविष्य की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को केवल पारंपरिक प्रशासनिक समस्याओं से ही नहीं जूझना होगा। सूचना युद्ध, डीपफेक, एल्गोरिथम से जुड़ी पक्षपात की समस्याएं और जलवायु न्याय जैसे नए विषय प्रशासन के सामने होंगे। ऐसे में चयन प्रक्रिया में उम्मीदवारों की जटिल समस्याओं को समझने, समाधान खोजने और भविष्य की परिस्थितियों का अनुमान लगाने की क्षमता को भी महत्व देना होगा।

प्रधानमंत्री ने परीक्षा व्यवस्था में समयबद्धता की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि लंबी परीक्षा प्रक्रिया का असर अभ्यर्थियों और उनके परिवारों पर आर्थिक रूप से भी पड़ता है। कोचिंग शुल्क, आवास, भोजन और आने-जाने के खर्च के कारण लंबे समय तक चलने वाला परीक्षा चक्र कई युवाओं के लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है। इसलिए परीक्षा प्रक्रिया को कम समय में पूरा करना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि समान अवसर उपलब्ध कराने से जुड़ा विषय भी है।

उन्होंने यूपीएससी के साथ राज्य लोक सेवा आयोगों की भूमिका का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि विभिन्न राज्यों के चयन आयोगों के बीच अनुभव और श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों का आदान-प्रदान होना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित सम्मेलनों को और अधिक प्रभावी बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रक्रियाओं और तकनीकी क्षमता का अध्ययन किया जा सकता है। इससे चयन प्रक्रियाओं में सुधार और प्रक्रियाओं के मानकीकरण में मदद मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने आयोगों के लगातार क्षमता निर्माण पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप संस्थाओं को स्वयं को लगातार अपडेट करते रहना होगा। अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए मिशन कर्मयोगी के तहत विकसित डिजिटल प्लेटफार्मों का अधिक उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने आई-जीओटी प्लेटफॉर्म का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे प्रशासनिक अधिकारियों को नई तकनीक, नई कार्यप्रणाली और बदलती जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण देने में मदद मिल सकती है।

प्रधानमंत्री ने प्रशासनिक सेवाओं में अवसरों के बढ़ते दायरे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अब प्रशासनिक सेवाओं में केवल बड़े शहरों या पारंपरिक अभिजात वर्ग तक अवसर सीमित नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। महिलाओं की भागीदारी में भी वृद्धि हुई है। प्रधानमंत्री के अनुसार 1952 में प्रशासनिक सेवाओं में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी करीब तीन प्रतिशत थी, जो अब 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। उन्होंने इसे देश में अवसरों के विस्तार से जोड़ते हुए कहा कि बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इससे प्रतिभा के व्यापक आधार को अवसर मिला है।

यूपीएससी की परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या में भी समय के साथ बड़ा बदलाव आया है। प्रधानमंत्री ने 1976 में आयोग की स्वर्ण जयंती के बाद से परीक्षा में भाग लेने वाले उम्मीदवारों की संख्या में करीब 45 गुना वृद्धि का उल्लेख किया। उनके अनुसार यह देश में उपलब्ध प्रतिभा के बड़े आधार को दर्शाता है और चयन आयोगों की जिम्मेदारी को भी बढ़ाता है।

उन्होंने आयोग के सदस्यों और अधिकारियों को याद दिलाया कि यूपीएससी केवल उम्मीदवारों का चयन करने वाली संस्था नहीं है। इसके माध्यम से चुने जाने वाले अधिकारी आगे चलकर सरकार और नागरिक के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बनते हैं। इसलिए चयन प्रक्रिया में योग्य और जिम्मेदार व्यक्तियों का चयन प्रशासन की गुणवत्ता पर सीधे असर डालता है।

प्रधानमंत्री ने प्रशिक्षु अधिकारियों के लिए आत्मनिरीक्षण की व्यवस्था विकसित करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं को प्रशासनिक सेवा में आने की अपनी मूल प्रेरणा को लिखकर रखना चाहिए। भविष्य में जब उन्हें कठिन परिस्थितियों और जिम्मेदारियों का सामना करना पड़े, तो वे अपनी मूल प्रेरणा को याद कर सकें। उन्होंने यूपीएससी और राज्य लोक सेवा आयोगों से भी उम्मीदवारों के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर विचार करने को कहा।

शताब्दी समारोह के अवसर पर यूपीएससी की ऐतिहासिक यात्रा को भी याद किया गया। प्रधानमंत्री ने संस्था की स्वतंत्रता, निष्पक्षता, योग्यता आधारित चयन, गोपनीयता और निष्पक्ष प्रक्रिया को उसकी मूल पहचान बताया। उन्होंने कहा कि समय के साथ प्रक्रियाओं में बदलाव और तकनीक का समावेश जरूरी है, लेकिन संस्था की विश्वसनीयता से जुड़े मूल सिद्धांतों को कायम रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने यूपीएससी शताब्दी स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया। इसके साथ ‘भारत में यूपीएससी और लोक सेवा आयोगों की नीतियों को आकार देने वाले 100 ऐतिहासिक निर्णय’ पुस्तक का भी विमोचन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद और यूपीएससी के अधिकारी शामिल हुए।

एक सदी पूरी कर चुका यूपीएससी अब अपनी दूसरी सदी की ओर बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री के संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि बदलती तकनीक, बढ़ती जन आकांक्षाओं और नई वैश्विक चुनौतियों के बीच प्रशासनिक सेवाओं को भी अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। लेकिन इस बदलाव के बीच चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता, योग्यता और संस्थागत विश्वसनीयता को बनाए रखना होगा। यही वे आधार हैं, जिनके सहारे यूपीएससी ने एक सदी की यात्रा पूरी की है और जिनके साथ उसे आने वाली सदी की प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ना होगा।

By admin