राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर सैनी की डॉ. राजीव कुरेले से विशेष बातचीत

देहरादून। बदलती जीवनशैली, अनियमित खान-पान, तनाव, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे समय में आयुर्वेद की भूमिका को लेकर नए सिरे से चर्चा हो रही है। 2026 में मनाए गए 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस की थीम “Ayurveda for a Healthier Tomorrow” यानी “स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद” रही। इस वर्ष प्रमाण-आधारित आयुर्वेद, शोध एवं नवाचार, समन्वित स्वास्थ्य सेवा तथा सामुदायिक स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया गया।

आयुर्वेद को लेकर समाज में कई धारणाएं भी हैं। कोई इसे केवल जड़ी-बूटी और घरेलू नुस्खों तक सीमित मानता है तो कोई हर बीमारी का इलाज। वहीं बिना सलाह दवा लेने, सोशल मीडिया के वायरल नुस्खों और पंचकर्म को लेकर भी सवाल हैं। इन्हीं मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर सैनी ने उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, हर्रावाला, देहरादून के शैक्षणिक अधीक्षक एवं सुप्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. राजीव कुरेले से बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश।

सवाल : आज के दौर में आयुर्वेद की सबसे बड़ी प्रासंगिकता क्या है?

डॉ. राजीव कुरेले : आज लोग केवल बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने का तरीका भी जानना चाहते हैं। आयुर्वेद का मूल उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का उपचार है। इसलिए यह केवल दवा नहीं, बल्कि आहार, दिनचर्या, नींद और जीवनशैली से जुड़ी व्यापक स्वास्थ्य दृष्टि है।

सवाल : क्या आयुर्वेद सिर्फ जड़ी-बूटी और काढ़े तक सीमित है?

डॉ. राजीव कुरेले : बिल्कुल नहीं। जड़ी-बूटियां इसका एक हिस्सा हैं। आयुर्वेद में आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, निद्रा, मानसिक स्वास्थ्य, औषध चिकित्सा और पंचकर्म सहित कई पहलू शामिल हैं। व्यक्ति की उम्र, प्रकृति, खान-पान और रोग की अवस्था को ध्यान में रखना भी इसकी विशेषता है।

सवाल : क्या एक ही बीमारी के दो मरीजों का उपचार अलग हो सकता है?

डॉ. राजीव कुरेले : कई परिस्थितियों में हां। बीमारी का नाम समान हो सकता है, लेकिन दोनों व्यक्तियों की आयु, शारीरिक स्थिति, प्रकृति, जीवनशैली और रोग की अवस्था अलग हो सकती है। इसलिए आयुर्वेद व्यक्ति को भी उपचार का महत्वपूर्ण आधार मानता है।

सवाल : आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा को लेकर अक्सर टकराव की बात होती है। आपकी राय?

डॉ. राजीव कुरेले : असली लक्ष्य चिकित्सा पद्धतियों की प्रतिस्पर्धा नहीं, मरीज का बेहतर स्वास्थ्य है। जहां आवश्यक हो, विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों की विशेषज्ञता का वैज्ञानिक समन्वय किया जा सकता है। लेकिन मरीज को खुद अलग-अलग दवाएं मिलाकर नहीं लेनी चाहिए। चिकित्सकीय मार्गदर्शन और मरीज की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।

सवाल : क्या आयुर्वेद हर बीमारी का इलाज कर सकता है?

डॉ. राजीव कुरेले : किसी भी चिकित्सा प्रणाली के बारे में यह कहना कि वह हर बीमारी को निश्चित रूप से ठीक कर सकती है, उचित नहीं है। आयुर्वेद में व्यापक चिकित्सकीय ज्ञान है और शोध भी हो रहा है, लेकिन सभी उपचारों के प्रमाण समान स्तर के नहीं हैं। हमें न चमत्कारी दावों पर भरोसा करना चाहिए और न बिना समझे आयुर्वेद को खारिज करना चाहिए।

सवाल : ‘प्राकृतिक है, इसलिए सुरक्षित है’—क्या यह धारणा सही है?

डॉ. राजीव कुरेले : नहीं। प्राकृतिक पदार्थ भी औषधीय प्रभाव रखते हैं। गलत दवा, गलत मात्रा या गलत व्यक्ति में उसका सेवन नुकसान कर सकता है। इसलिए आयुर्वेदिक औषधि को भी औषधि ही समझना चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगियों में चिकित्सकीय सलाह विशेष रूप से जरूरी है।

सवाल : सोशल मीडिया पर वायरल आयुर्वेदिक नुस्खों को लेकर जनता क्या सावधानी रखे?

डॉ. राजीव कुरेले : वायरल होना वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत अनुभव भी चिकित्सा प्रमाण नहीं माना जा सकता। स्वास्थ्य संबंधी जानकारी विश्वसनीय स्रोत से लें और दवा शुरू करने से पहले योग्य चिकित्सक से परामर्श करें। स्व-चिकित्सा से बचना जरूरी है।

सवाल : जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में आयुर्वेद क्या भूमिका निभा सकता है?

डॉ. राजीव कुरेले : मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं में भोजन, शारीरिक गतिविधि, नींद और तनाव महत्वपूर्ण हैं। आयुर्वेद आहार और दिनचर्या को महत्व देता है। लेकिन गंभीर बीमारी में केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहना उचित नहीं है। उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।

सवाल : पंचकर्म को आजकल ‘डिटॉक्स’ के नाम पर प्रचारित किया जा रहा है। वास्तविकता क्या है?

डॉ. राजीव कुरेले : पंचकर्म को केवल ‘डिटॉक्स पैकेज’ कहना सही नहीं है। यह विशिष्ट चिकित्सकीय प्रक्रियाओं का समूह है और हर व्यक्ति को इसकी आवश्यकता नहीं होती। इसका निर्णय प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक मरीज की स्थिति देखकर करता है।

सवाल : इस वर्ष के राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस की थीम ‘स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद’ का वास्तविक संदेश क्या है?

डॉ. राजीव कुरेले : इसका संदेश आयुर्वेद को भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियों से जोड़ना है। इसके लिए preventive healthcare, शोध, प्रमाण, नवाचार, स्वस्थ जीवनशैली और समुदाय के स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। परंपरागत ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक शोध के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है।

सवाल : युवाओं को आयुर्वेद से कैसे जोड़ा जा सकता है?

डॉ. राजीव कुरेले : युवाओं से केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि आयुर्वेद प्राचीन है। उन्हें तर्क और प्रमाण के साथ समझाना होगा। समय पर सोना, संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, मानसिक संतुलन और अनुशासित दिनचर्या आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आधुनिक जीवनशैली के संदर्भ में समझाना होगा।

सवाल : अंत में, आयुर्वेद दिवस पर आम नागरिक के लिए आपका संदेश?

डॉ. राजीव कुरेले : आयुर्वेद दिवस को केवल एक दिन का उत्सव न बनाएं। अपनी दिनचर्या, भोजन, नींद, शारीरिक गतिविधि और मानसिक स्वास्थ्य की समीक्षा करें। बिना सलाह दवा लेने से बचें और विश्वसनीय जानकारी पर भरोसा करें। स्वास्थ्य अस्पताल में ही नहीं बनता, हमारी रोज की आदतें भी स्वास्थ्य का निर्माण करती हैं।

 

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