लेखक : डॉ. राजीव कुरेले
आयुर्वेद का बढ़ता बाजार खोल रहा रोजगार और उद्योग की नई राहें, देवभूमि में चिकित्सा, शिक्षा, औषधीय पौधों और स्वास्थ्य पर्यटन को एक साथ जोड़ने की तैयारी
देहरादून। बदलती जीवनशैली, बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और रोगों से बचाव पर बढ़ते जोर के बीच आयुर्वेद एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था के केंद्र में अपनी मजबूत जगह बना रहा है। कभी केवल पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के रूप में देखा जाने वाला आयुर्वेद आज चिकित्सा, स्वास्थ्य संरक्षण, योग, प्राकृतिक जीवनशैली, पोषण, औषधीय पौधों, पंचकर्म, स्वास्थ्य पर्यटन और औषधि निर्माण जैसे अनेक क्षेत्रों को जोड़ने वाले बड़े आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहा है।
भारत सरकार के आयुष संबंधी एक दशक के विकास दस्तावेज में शोध एवं सूचना प्रणाली से जुड़े अध्ययन के आधार पर वर्ष 2020 के आसपास आयुष औषधि निर्माण क्षेत्र का आकार करीब एक लाख 38 हजार करोड़ रुपये और आयुष सेवाओं का आकार करीब एक लाख 67 हजार करोड़ रुपये आंका गया था। दोनों को मिलाकर यह क्षेत्र करीब तीन लाख चार हजार करोड़ रुपये के आसपास का आर्थिक क्षेत्र बन चुका था।
इसके बाद आयुष क्षेत्र के विस्तार की गति और तेज हुई। वर्ष 2025 में आयुष मंत्रालय के सचिव राजेश कोटेचा की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार भारत का आयुष क्षेत्र वर्ष 2014 में करीब 2.85 अरब अमेरिकी डालर के स्तर से बढ़कर वर्ष 2024 में अनुमानित 23 अरब अमेरिकी डालर तक पहुंच गया। यह वृद्धि बताती है कि आयुष अब केवल उपचार की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

आयुर्वेद बाजार में तेज विस्तार की संभावना
बाजार संबंधी अध्ययनों में भी आयुर्वेद के लिए आने वाले वर्षों में तेज वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है। ग्रैंड व्यू रिसर्च के अनुसार भारत में आयुर्वेद बाजार वर्ष 2024 में करीब 11.83 अरब अमेरिकी डालर का था, जिसके वर्ष 2030 तक बढ़कर करीब 35.74 अरब अमेरिकी डालर तक पहुंचने का अनुमान है।
इस वृद्धि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आयुर्वेद का दायरा अब केवल चिकित्सालय और औषधियों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य संरक्षण, रोगों की रोकथाम, योग, ध्यान, पंचकर्म, प्राकृतिक चिकित्सा, पौष्टिक आहार, व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल, औषधीय पौधों की खेती और स्वास्थ्य पर्यटन जैसे क्षेत्र भी इसके साथ तेजी से जुड़ रहे हैं।
यानी आयुर्वेद आने वाले समय में उपचार के साथ-साथ स्वास्थ्य आधारित अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकता है।
उत्तराखंड में आयुर्वेद के लिए प्राकृतिक आधार
यदि देश में किसी राज्य को आयुर्वेद आधारित समग्र स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने के लिए प्राकृतिक अवसर प्राप्त हैं तो उत्तराखंड उनमें प्रमुख है। हिमालय की जैव विविधता, दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां, पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक वातावरण और आध्यात्मिक पर्यटन की समृद्ध परंपरा राज्य को विशिष्ट आधार प्रदान करती है।
देवभूमि उत्तराखंड में आयुर्वेद की जड़ें केवल आधुनिक संस्थानों तक सीमित नहीं हैं। यहां प्राचीन ऋषि परंपरा, गुरुकुल परंपरा और वनौषधियों के उपयोग का लंबा इतिहास रहा है। प्रदेश में दो सौ वर्ष से अधिक पुरानी ऋषिकुल एवं गुरुकुल परंपरा से जुड़े संस्थान आज भी आयुर्वेद शिक्षा की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
इसी विरासत को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और चिकित्सा व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय तथा उससे संबद्ध संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
अस्पतालों से गांवों तक पहुंच रहा आयुर्वेद
उत्तराखंड में आयुर्वेद को बढ़ावा देने के प्रयास केवल बड़े चिकित्सालयों तक सीमित नहीं हैं। सरकारी आयुर्वेदिक चिकित्सालयों के साथ विभिन्न स्थानों पर अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में आयुष सेवाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर तक आयुष सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि लोगों को स्वास्थ्य संरक्षण और रोगों की रोकथाम के लिए स्थानीय स्तर पर ही आयुर्वेदिक परामर्श और उपचार की सुविधा मिल सके।
यह व्यवस्था विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है जहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच अभी भी चुनौतीपूर्ण है।
विशेषज्ञ मानव संसाधन पर भी जोर
किसी भी चिकित्सा पद्धति की सफलता केवल भवन और उपकरणों से नहीं होती। उसके लिए प्रशिक्षित चिकित्सकों और तकनीकी कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। उत्तराखंड में आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए चिकित्सा अधिकारियों, फार्मासिस्टों, परिचारिकाओं, पंचकर्म सहायकों तथा योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिलेगी बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार होंगे।
विशेष चिकित्सा केंद्रों की ओर बढ़ते कदम
आयुर्वेद को केवल सामान्य उपचार तक सीमित रखने के बजाय विशेष चिकित्सा सेवाओं से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर विशिष्ट आयुर्वेदिक सेवाओं के लिए उत्कृष्टता केंद्र विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
इनमें पंचकर्म, क्षारसूत्र, जीवनशैली से जुड़े रोगों में सुधार, अस्थि एवं मांसपेशी संबंधी विकार, तंत्रिका तंत्र से जुड़े रोग तथा नेत्र संबंधी उपचार जैसी सेवाओं को विशेष रूप से विकसित किया जा सकता है।
इस प्रकार की विशेषज्ञ सेवाएं उत्तराखंड को देश के विभिन्न हिस्सों से उपचार के लिए आने वाले लोगों का केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
तकनीक से जुड़ रहा पारंपरिक ज्ञान
आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ना भी समय की आवश्यकता है। उत्तराखंड में दूरस्थ चिकित्सकीय परामर्श जैसी सुविधाओं के माध्यम से लोगों तक आयुर्वेदिक सेवाएं पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रकृति परीक्षण जैसी डिजिटल सुविधाएं व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं को समझने में सहायक हो सकती हैं। इससे आयुर्वेद को नई पीढ़ी तक आधुनिक माध्यमों के जरिए पहुंचाने का अवसर भी मिलता है।
औषधीय पौधों की खेती बन सकती है ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार
उत्तराखंड की सबसे बड़ी संभावनाओं में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती शामिल है। पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल औषधीय पौधों का संरक्षण और वैज्ञानिक ढंग से उत्पादन किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।
लेकिन इसके लिए केवल जंगलों से जड़ी-बूटियां एकत्र करने की परंपरा पर्याप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि औषधीय वनस्पतियों का वैज्ञानिक संरक्षण, प्रमाणित पौध सामग्री, नियंत्रित खेती, उचित प्रसंस्करण और बाजार से सीधा जुड़ाव विकसित किया जाए।
यदि किसान से लेकर औषधि निर्माता तक पूरी श्रृंखला मजबूत होती है तो इसका लाभ पर्वतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिल सकता है।
शिक्षा और अनुसंधान को उद्योग से जोड़ना जरूरी
उत्तराखंड में आयुर्वेद शिक्षा का मजबूत आधार मौजूद है। उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के साथ प्रदेश में अनेक निजी आयुर्वेदिक शिक्षण संस्थान भी संचालित हैं। यह मानव संसाधन प्रदेश के आयुर्वेद आधारित विकास का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा संस्थानों को अनुसंधान, औषधि निर्माण, औषधीय पौधों की खेती और उद्योगों से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए।
औषधियों की गुणवत्ता, मानकीकरण, सुरक्षा, औषधि दुष्प्रभावों की निगरानी, चिकित्सकीय अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रमाणों पर लगातार काम होने से आयुर्वेद की विश्वसनीयता और वैश्विक स्वीकार्यता और मजबूत हो सकती है।
प्रदेश में आयुष उद्योग के लिए भी अवसर
उत्तराखंड में औषधि एवं आयुष आधारित उद्योगों के विकास की संभावनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। सेलाकुई, सिडकुल, सितारगंज और कोटद्वार जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में आयुष से जुड़े उद्योगों की मौजूदगी इस दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रही है।
यदि औषधीय पौधों की खेती को उद्योगों की आवश्यकता से जोड़ा जाए और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्धन की व्यवस्था विकसित की जाए तो प्रदेश में रोजगार की नई श्रृंखला बन सकती है।
इसमें किसान, वन उत्पादक, शोधकर्ता, चिकित्सक, औषधि निर्माता, पैकेजिंग क्षेत्र, परिवहन, विपणन और पर्यटन क्षेत्र सभी को लाभ मिल सकता है।
पंचकर्म और स्वास्थ्य पर्यटन की बड़ी संभावना
उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण, हिमालयी क्षेत्र, धार्मिक स्थल और योग की परंपरा इसे स्वास्थ्य पर्यटन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बनाती है।
यदि पंचकर्म, योग, ध्यान, आयुर्वेदिक आहार, प्राकृतिक वातावरण और स्थानीय औषधीय परंपराओं को वैज्ञानिक ढंग से एकीकृत किया जाए तो उत्तराखंड देश-विदेश से आने वाले स्वास्थ्य पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
इसके लिए केवल उपचार केंद्र खोलना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशिक्षित विशेषज्ञ, गुणवत्तापूर्ण सेवाएं, प्रमाणित औषधियां, स्वच्छता, रोगी सुरक्षा, वैज्ञानिक अभिलेख और पारदर्शी व्यवस्था को समान महत्व देना होगा।
‘आयुष प्रदेश’ की दिशा में तैयार हो रहा व्यापक तंत्र
उत्तराखंड में आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए जिस प्रकार चिकित्सा, शिक्षा, अनुसंधान, औषधीय वनस्पति, उद्योग, योग, पंचकर्म और पर्यटन को एक साथ जोड़ने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, उससे प्रदेश के सामने एक व्यापक आयुष आधारित विकास मॉडल तैयार करने का अवसर है।
एक ओर हिमालय की जैव विविधता और दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां हैं, दूसरी ओर आयुर्वेद शिक्षा की पुरानी परंपरा और आधुनिक विश्वविद्यालय तथा शिक्षण संस्थान। इसके साथ सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं, निजी शिक्षण संस्थान, औषधि उद्योग और पर्यटन क्षेत्र मौजूद हैं।
इन सभी को एक साझा व्यवस्था से जोड़ दिया जाए तो आयुर्वेद प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
गुणवत्ता ही बनेगी वैश्विक पहचान की कुंजी
आयुर्वेद की बढ़ती लोकप्रियता के साथ गुणवत्ता और वैज्ञानिक प्रमाणों की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है। शुद्ध और मानकीकृत औषधियों का निर्माण, औषधीय पौधों का संरक्षण, प्रमाणित खेती, वैज्ञानिक अनुसंधान, चिकित्सकीय प्रमाण, उचित निदान और प्रशिक्षित चिकित्सकों की उपलब्धता पर निरंतर ध्यान देना होगा।
परंपरागत ज्ञान को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों से उसका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाना आवश्यक है। यही संतुलन आयुर्वेद को भारत के साथ-साथ वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में और मजबूत स्थान दिला सकता है।
उत्तराखंड के पास प्राकृतिक संसाधन, परंपरा, शिक्षा संस्थान, चिकित्सा व्यवस्था और पर्यटन की जो संयुक्त शक्ति है, वह उसे आयुष आधारित स्वास्थ्य एवं पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने का आधार प्रदान करती है। आने वाले वर्षों में यदि इन क्षेत्रों को योजनाबद्ध तरीके से जोड़ा जाता है तो देवभूमि उत्तराखंड केवल आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद, स्वास्थ्य, योग और कल्याण आधारित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
लेखक : डॉ. राजीव कुरेले
सह-आचार्य एवं शैक्षणिक अधीक्षक, मुख्य परिसर
आयुर्वेद संकाय, उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, हर्रावाला, देहरादून
