किताबों से दोस्ती का संदेश लेकर शुरू हुआ 16वां देहरादून किताब कौतिक

75 प्रकाशकों की 80 हजार पुस्तकें बनीं आकर्षण, साहित्यिक परिचर्चाओं के साथ संस्कृति और विज्ञान की गतिविधियां भी शुरू

देहरादून। पहाड़ की संस्कृति, साहित्य और लोक परंपराओं को सहेजने के साथ युवाओं में पढ़ने की आदत विकसित करने के उद्देश्य से शुक्रवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में 16वें देहरादून किताब कौतिक का शुभारंभ हुआ। 23 से 25 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय पुस्तक मेले की मुख्य थीम ‘आओ, दोस्ती करें किताबों से’ रखी गई है। मेले में देशभर के 75 प्रकाशकों की करीब 80 हजार पुस्तकें पाठकों के लिए उपलब्ध हैं। साहित्यिक चर्चाओं के साथ विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, करियर काउंसलिंग और सांस्कृतिक गतिविधियां भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी।

किताब कौतिक का उद्घाटन दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के संस्थापक प्रो. बीके जोशी, प्रख्यात लोक गायिका पद्मश्री बसंती बिष्ट और पर्यावरणविद् पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। उद्घाटन दिवस पर विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों के साथ साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लोगों ने मेले में भागीदारी की।

किताब कौतिक अभियान के संयोजक हेम पंत ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल 80 हजार पुस्तकें देहरादून लाना नहीं है, बल्कि युवाओं के भीतर जिज्ञासा और रचनात्मकता विकसित करने के साथ उनमें पढ़ने की आदत का बीज बोना भी है। उन्होंने कहा कि किताबें व्यक्ति की सोच को व्यापक बनाती हैं और समाज को ज्ञान से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रो. बीके जोशी ने किताब कौतिक की पहल को सराहनीय बताते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन नियमित रूप से होने चाहिए। पद्मश्री बसंती बिष्ट ने कहा कि किताबों का आकर्षण असीम है। वे हमारी जानकारी का दायरा बढ़ाती हैं और समाज में हमारी पहचान बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पर्यावरणविद् पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि किताबें जीवन को सुव्यवस्थित करने के साथ सकारात्मक ज्ञान बढ़ाती हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों पर चिंता जताते हुए इनके प्रति सजग रहने और बचाव के उपायों को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।

देहरादून के इतिहास, विरासत और बदलावों पर मंथन

मेले के पहले सत्र में देहरादून के इतिहास, विरासत और भविष्य पर चर्चा की गई। इतिहासकार अजय शर्मा ने देहरादून के प्राचीन इतिहास, गंगा और यमुना के बीच के लगभग 50 किलोमीटर के क्षेत्र से जुड़ी ऐतिहासिक कहानियों, अशोक के शिलालेख और बाड़वाला के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति के अध्यक्ष विजय भट्ट ने वर्ष 1803 के भूकंप, 1804 के नेपाल आक्रमण और वर्ष 1815 में क्षेत्र के ब्रिटिश शासन के अधीन आने तक की ऐतिहासिक घटनाओं पर चर्चा की। वहीं, योगेश भट्ट ने राज्य गठन के बाद देहरादून में हुए तेजी से शहरीकरण, पूर्वी और पश्चिमी नहरों में आए बदलावों तथा पिछले 25 वर्षों में शहर के स्वरूप में हुए व्यापक परिवर्तनों का उल्लेख किया। सत्र का संचालन राहुल कोटियाल ने किया।

साहित्यकारों के योगदान को किया याद

दूसरे सत्र में देहरादून के साहित्यिक परिदृश्य पर चर्चा हुई। डॉ. इंद्रजीत सिंह ने एफआरआई से जुड़े वैज्ञानिक एवं साहित्यकार डॉ. पूर्ण सिंह, लीलाधर जगूड़ी और दिवंगत साहित्यकार सुभाष पंत के योगदान को याद किया।

राजेश सकलानी ने देहरादून के साहित्यिक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए सरदार पूर्ण सिंह, एमएन राय, रशीद जहां, शमशेर बहादुर सिंह और हरिवंशराय बच्चन के दून प्रवास का उल्लेख किया। मुकेश नौटियाल ने देहरादून की व्यवस्थाओं और राजधानी बनने के बाद आए सांस्कृतिक बदलावों पर अपने विचार रखे। उन्होंने शहर की साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने के लिए साहित्यिक संग्रहालय स्थापित करने की मांग भी उठाई। सत्र का संचालन निक्की पुष्कर ने किया।

पुस्तकों का लोकार्पण, सैन्य विरासत पर भी चर्चा

कार्यक्रम में सुरेंद्र दत्त सेमल्टी की पुस्तक ‘आओ गढ़वाली सीखें’ का लोकार्पण किया गया। इसका समन्वय ज्योत्सना जोशी ने किया। इसके साथ ही देवेश जोशी की पुस्तक ‘उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन’ का लोकार्पण हुआ और इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।

‘उत्तराखंड की सैन्य विरासत’ विषय पर आयोजित सत्र में कर्नल सुनील कोटनाला ने सीमाओं पर तैनात उत्तराखंड के सैन्य अधिकारियों और जवानों के अदम्य साहस तथा समर्पण के प्रेरक उदाहरण साझा किए। इस सत्र का समन्वय शीशपाल गुसाईं ने किया।

बच्चों की हस्तलिखित किताबों का विशेष स्टॉल

पुस्तक मेले में साहित्यिक परिचर्चाओं के अलावा करियर काउंसलिंग, विज्ञान कोना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी गतिविधियां, नेचर वॉक और साहसिक खेल भी आयोजित किए जा रहे हैं। इसके अलावा आमंत्रित कलाकारों की सांस्कृतिक संध्याएं, हस्तशिल्प स्टॉल, कठपुतली निर्माण, भाषा एवं संस्कृति तथा वॉल पेंटिंग कार्यशालाएं भी मेले का हिस्सा हैं।

14 से 18 अक्टूबर तक आयोजित पांच दिवसीय ‘बालप्रहरी बाल लेखन कार्यशाला’ में स्कूली बच्चों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित पुस्तकों को भी विशेष स्टॉल पर प्रदर्शित किया गया है। यह पहल बच्चों की लेखन प्रतिभा और रचनात्मकता को मंच देने के साथ उन्हें किताबों से जोड़ने का प्रयास है।

तीन दिवसीय किताब कौतिक के माध्यम से आयोजकों ने साहित्य और पुस्तकों को आमजन, विशेषकर युवाओं और बच्चों के करीब लाने का प्रयास किया है। मेले में विभिन्न विषयों की पुस्तकों, विचार-विमर्श और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए पाठकों को ज्ञान, संस्कृति और साहित्य से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

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