Share this Post

मातृ मृत्यु अनुपात में रिकॉर्ड गिरावट, संस्थागत प्रसव 90.6 प्रतिशत तक पहुंचा, 1.24 करोड़ से अधिक हाई रिस्क गर्भावस्थाओं की हुई पहचान

नई दिल्ली। देश में गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2016 में शुरू किया गया प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) आज मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता की कहानी बनकर सामने आया है। इस अभियान के माध्यम से अब तक 7.91 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व (एएनसी) सेवाएं उपलब्ध कराई जा चुकी हैं, जबकि 1.24 करोड़ से अधिक उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं (हाई रिस्क प्रेग्नेंसी) की समय रहते पहचान कर उनका उपचार और निगरानी सुनिश्चित की गई है।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में अभियान की उपलब्धियों और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने देश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच में उल्लेखनीय सुधार किया है। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य प्रत्येक गर्भवती महिला तक सुरक्षित, समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है ताकि मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में और अधिक कमी लाई जा सके।

मातृ मृत्यु अनुपात में 43 अंकों की ऐतिहासिक कमी

सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत ने मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014-16 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) 130 था, जो घटकर 2022-24 में 87 रह गया है।

यानी आठ वर्षों में मातृ मृत्यु अनुपात में 43 अंकों की कमी दर्ज की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर प्रसवपूर्व जांच, संस्थागत प्रसव, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता और जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की शीघ्र पहचान ने इस उपलब्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पहली तिमाही में पंजीकरण में बड़ा सुधार

सरकार ने बताया कि गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में पंजीकरण कराने वाली महिलाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के अनुसार वर्ष 2015-16 में पहली तिमाही के दौरान प्रसवपूर्व पंजीकरण कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 58.6 था, जबकि एनएफएचएस-6 (2023-24) में यह बढ़कर 76.2 प्रतिशत हो गया।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार शुरुआती पंजीकरण से गर्भावस्था के दौरान संभावित जोखिमों की समय रहते पहचान हो जाती है, जिससे मां और गर्भस्थ शिशु दोनों की बेहतर देखभाल संभव हो पाती है।

प्रसवपूर्व जांच कराने वाली माताओं की संख्या बढ़ी

सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान का एक बड़ा प्रभाव नियमित प्रसवपूर्व जांच में भी देखने को मिला है।

एनएफएचएस-4 के दौरान चार या उससे अधिक एएनसी जांच कराने वाली माताओं का प्रतिशत 51.2 था, जो एनएफएचएस-6 में बढ़कर 65.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित एएनसी जांच से एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, भ्रूण की स्थिति, कुपोषण और अन्य जटिलताओं का समय पर पता चल जाता है, जिससे गंभीर जोखिमों को काफी हद तक टाला जा सकता है।

संस्थागत प्रसव में भी उल्लेखनीय वृद्धि

सरकार ने बताया कि सुरक्षित प्रसव को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयासों का सकारात्मक परिणाम संस्थागत प्रसव के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है।

एनएफएचएस-4 के अनुसार वर्ष 2015-16 में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 78.9 था, जबकि एनएफएचएस-6 (2023-24) में यह बढ़कर 90.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

इसका अर्थ है कि अब अधिकांश गर्भवती महिलाएं अस्पतालों या स्वास्थ्य संस्थानों में प्रशिक्षित चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की देखरेख में प्रसव करा रही हैं, जिससे जटिलताओं और मृत्यु के जोखिम में उल्लेखनीय कमी आई है।

क्या है प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की शुरुआत वर्ष 2016 में इस उद्देश्य के साथ की गई थी कि प्रत्येक गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान कम से कम एक बार विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व जांच उपलब्ध कराई जा सके।

इस अभियान के अंतर्गत हर महीने की 9 तारीख को देशभर के निर्धारित सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं।

इन सेवाओं में चिकित्सकीय परीक्षण, आवश्यक प्रयोगशाला जांच, अल्ट्रासाउंड, रक्तचाप जांच, दवाइयां, पोषण संबंधी सलाह, जोखिम मूल्यांकन तथा आवश्यक परामर्श शामिल हैं।

देशभर के स्वास्थ्य संस्थानों में मिलती हैं सेवाएं

अभियान के तहत जिला अस्पताल, उपमंडल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा प्रथम रेफरल इकाइयों (एफआरयू) में विशेष प्रसवपूर्व जांच शिविर आयोजित किए जाते हैं।

इन शिविरों में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों, चिकित्सा अधिकारियों तथा प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा गर्भवती महिलाओं की विस्तृत जांच की जाती है।

यदि किसी महिला में जटिल गर्भावस्था के संकेत मिलते हैं तो उसे तुरंत उच्च स्तरीय स्वास्थ्य संस्थान में रेफर कर आवश्यक उपचार सुनिश्चित किया जाता है।

समूह परामर्श पर भी विशेष जोर

सरकार ने बताया कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान केवल चिकित्सकीय जांच तक सीमित नहीं है।

इसके अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, आयरन एवं कैल्शियम की नियमित खुराक, स्तनपान, संस्थागत प्रसव, नवजात शिशु की देखभाल तथा गर्भावस्था के दौरान अपनाई जाने वाली सावधानियों के बारे में भी जानकारी दी जाती है।

इसके लिए समूह परामर्श सत्र आयोजित किए जाते हैं ताकि महिलाएं सही जानकारी प्राप्त कर सकें और स्वस्थ मातृत्व की दिशा में जागरूक बन सकें।

उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था पर विशेष फोकस

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार अभियान का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं (हाई रिस्क प्रेग्नेंसी) की समय रहते पहचान करना है।

वर्ष 2016 से अब तक 1.24 करोड़ से अधिक ऐसी गर्भावस्थाओं की पहचान की जा चुकी है, जिनमें मां या गर्भस्थ शिशु को विशेष चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता थी।

इन मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा लगातार निगरानी, समय पर उपचार और आवश्यक रेफरल की व्यवस्था की गई।

ई-पीएमएसएमए से होगी डिजिटल निगरानी

सरकार ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए विस्तारित ई-पीएमएसएमए (e-PMSMA) रणनीति लागू की है।

इसके अंतर्गत प्रत्येक उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिला का नाम आधारित डिजिटल पंजीकरण किया जाएगा तथा प्रसव के बाद 45 दिनों तक उसकी नियमित निगरानी की जाएगी।

इस डिजिटल प्रणाली के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक महिला समय पर जांच कराए और आवश्यकता पड़ने पर उसे तुरंत उपचार मिल सके।

तीन अतिरिक्त जांच की व्यवस्था

सरकार ने बताया कि उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं के लिए सामान्य जांच के अतिरिक्त तीन अतिरिक्त प्रसवपूर्व जांच अनिवार्य की गई हैं।

इन जांचों के दौरान विशेषज्ञ चिकित्सक मां और गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की विस्तार से समीक्षा करेंगे तथा आवश्यकता होने पर उपचार योजना में बदलाव भी करेंगे।

एसएमएस अलर्ट से मिलेगी समय पर जानकारी

ई-पीएमएसएमए के अंतर्गत लाभार्थियों और आशा कार्यकर्ताओं को स्वचालित एसएमएस अलर्ट भेजे जाएंगे।

इन संदेशों के माध्यम से जांच की तिथि, अगली चिकित्सकीय मुलाकात, फॉलोअप तथा आवश्यक सावधानियों की जानकारी समय-समय पर उपलब्ध कराई जाएगी।

इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कोई भी गर्भवती महिला निर्धारित जांच से वंचित न रहे।

एफआरयू से जोड़ा जाएगा प्रत्येक हाई रिस्क मामला

सरकार ने बताया कि सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था को निकटतम प्रथम रेफरल इकाई (एफआरयू) से जोड़ा जाएगा।

यदि किसी महिला की स्थिति गंभीर होती है तो उसे तत्काल उच्च स्तरीय अस्पताल भेजा जाएगा, जिससे प्रसव के दौरान किसी प्रकार की जटिलता को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।

नि:शुल्क परिवहन की भी सुविधा

उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच के लिए अस्पताल तक लाने-ले जाने की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार ने नि:शुल्क परिवहन प्रोत्साहन का भी प्रावधान किया है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दूरी या आर्थिक कठिनाई के कारण कोई भी महिला स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित न रहे।

निजी चिकित्सकों को भी जोड़ा गया अभियान से

सरकार ने बताया कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान में निजी क्षेत्र के स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों की भागीदारी भी बढ़ाई जा रही है।

इसके लिए ‘आई प्लेज फॉर 9’ (I Pledge for 9) अचीवर्स अवार्ड शुरू किया गया है, जिसके माध्यम से प्रत्येक माह की 9 तारीख को स्वैच्छिक सेवाएं देने वाले चिकित्सकों को सम्मानित किया जाता है।

इसके अलावा निजी चिकित्सकों के पंजीकरण के लिए एक केंद्रीकृत पीएमएसएमए पोर्टल भी विकसित किया गया है।

एफओजीएसआई और आईएमए का सहयोग

सरकार ने बताया कि अभियान को मजबूत बनाने के लिए फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) तथा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) जैसे प्रमुख पेशेवर संगठनों का भी सहयोग लिया जा रहा है।

इन संस्थाओं के माध्यम से अधिक से अधिक विशेषज्ञ चिकित्सकों को अभियान से जोड़ा जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान

स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान को विशेष रूप से ग्रामीण, आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में और प्रभावी बनाने के लिए कई अतिरिक्त कदम उठाए गए हैं।

प्रत्येक माह की निर्धारित 9 तारीख के अतिरिक्त भी विशेष जांच शिविर आयोजित किए जा रहे हैं ताकि उच्च जोखिम वाली महिलाओं की नियमित निगरानी की जा सके।

आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका हुई मजबूत

सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका को भी मजबूत किया है।

उन्हें उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान, पंजीकरण, अस्पताल तक पहुंचाने, जांच सुनिश्चित कराने तथा प्रसव के बाद फॉलोअप करने के लिए प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।

जागरूकता अभियान भी जारी

सरकार का कहना है कि सुरक्षित मातृत्व के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि जनजागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।

इसी उद्देश्य से सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी), व्यवहार परिवर्तन संचार (बीसीसी) तथा अंतरवैयक्तिक संचार (आईपीसी) के माध्यम से देशभर में लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

सरकार का लक्ष्य—हर मां और नवजात सुरक्षित रहे

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने देश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार का उद्देश्य है कि प्रत्येक गर्भवती महिला को समय पर गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल, सुरक्षित संस्थागत प्रसव और प्रसव के बाद समुचित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, डिजिटल ट्रैकिंग, विशेषज्ञ चिकित्सकों की भागीदारी और समुदाय आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था के माध्यम से मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में और कमी लाने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी रहेंगे।

By admin